Ticker

6/recent/ticker-posts

मुखौटा

मझ नहीं आता मुझे ज़िन्दगी की ये बेरुखी, जो इतने पास होने का दम भरते ....  वही क्यों?  दूर जाकर हमारे अकेलेपन के लिए दुवाए करते हैं, क्यों ओढ़ते हैं लोग ऐसे मुखोटो  को जिससे अपने ही पहचाननाने मैं धोखा खा जाते है, कुछ लोग शामिल है दुनिया मैं मेरे भी ऐसे ... जिनको चाहकर भी नहीं बोल पाता की.....  तुम हो क्यों ऐसे....? कलम से लिखते है जहां भर का प्रेम .... पर अपनों से मिलने में परहेज क्यों? हाथ पकड़कर साथ कैसे चला जाये, ये दुनिया को तो सिखाते हो जैसे, पर अपनों का हाथ पकड़ने मैं शर्म आती है क्यों? हर मुद्दों पर चली है कलम तेरी, पर खून के रिश्तो मैं रिश्तो मैं दीवार कड़ी क्यों?

माँ शब्द पर तो है जैसे तुम्हाराशब्द भंडार है भरा ... फिर माँ के एक कॉल आते ही क्योंउनके लिए प्रेम की जगह झुंझलाहट है भरा .... हर रिश्तो मैं प्रेम की चासनी हैसिर्फ तुम्हारी लेखनी मैं ही झलका।  काश ऐसे ही समझा होता हर रिश्ते को तो तुमने  ....  अब थक गया हु खुद ही मैं .... इस मुखोटे के जैसे अनजान हु इन सबसे मैं .... मुखोटो से भरी दुनिया मैं पहले ही बहुत है छलने को ...... तुम ये कसर रहने दो। 

Post a Comment

0 Comments